तू रहता कहां क्या तेरा पता | In the Search of Destiny and it's Destination

बुरा काम करने वाला पहले यह भली प्रकार देखता है कि मुझे देखने वाला या पकड़ने वाला तो कोई यहाँ नहीं है ? जब वह भली-भाँति विश्वास कर लेता है कि उसका पाप कर्म किसी की भी दृष्टि या पकड़ में नहीं आ रहा है तभी वह अपने काम में हाथ डालता है।
इस प्रकार जो व्यक्ति अपने आप को परमात्मा की दृष्टि या पकड़ से बाहर मानते हैं वे ही गलत काम करने को तत्पर हो सकते हैं। पाप कर्म करने का स्पष्ट अर्थ यह है कि वह व्यक्ति ईश्वर का मानने का दिखावा भले ही करता हो पर वास्तव में वह परमात्मा के आस्तित्व से इन्कार करता है। उसके मन को इस बात पर भरोसा नहीं होता है कि ईश्वर हर जगह मौजूद है।


जो व्यक्ति पुलिस के चपरासी को भी देखकर भय से थर-थर कापा करते हैं वे लोग इतने दुस्साहसी नहीं हो सकते कि परमात्मा की आँखों के आगे, न करने योग्य काम करें, उसके कानून को तोड़े, उसके धैर्य की परीक्षा लें और उसका अपमान करें। ऐसा दुस्साहस तो सिर्फ वही कर सकता है जो यह समझता हो कि ईश्वर कहने, सुनने भर की चीज है। वह पोथी पत्रों में, मन्दिर मठों में,नदी, तालाबों में या कहीं स्वर्ग नरक में भले ही रहता हो, पर हर जगह वह नहीं है। मैं उसकी दृष्टि और पकड़ से बाहर हूँ।


जो लोग परमात्मा की सर्व व्यापकता पर विश्वास नहीं करते, वे ही नास्तिक है। इन नास्तिकों में कुछ तो भजन या पूजा बिल्कुल नहीं करते, कुछ करते हैं। जो नहीं करते हैं वे सोचते हैं व्यर्थ का झंझट मोल लेकर उसमें समय गंवाने से क्या फायदा? जो पूजन भजन करते हैं वे भीतर से तो न करने वालों के समान ही होते हैं पर व्यापार बुद्धि से रोजगार के रूप में ईश्वर की खाल ओढ़ लेते हैं। कितने ही लोग ईश्वर के नाम के बहाने ही अपने जीविका चलाते हैं हमारे देश में न जाने कितने आदमी ऐसे हैं जिनकी कमाई, पेशा और रोजगार ईश्वर के नाम पर है।


यदि ये लोग यह प्रकट करें कि हम ईश्वर को नहीं मानते तो उसी दिन उनकी ऐश आराम देने वाली बिना परिश्रम की कमाई हाथ से चली जायेगी। इसलिए इन्हें ईश्वर को उसी प्रकार ओढ़े रहना पड़ता है। जैसे जाड़े से बचने के लिए गर्मी देने वाले कम्बल को ओढ़े रहते हैं जैसे ही वह जरूरत पूरी हुई वैसे ही कम्बल को एक कोने में पटक देते हैं। एेसे लोग अपना उद्देश्य पूरा होते ही अपने असली रूप में आ जाते हैं। एकान्त में पापों से खुलकर खेलते हुए उन्हें जरा भी झिझक नहीं होती है।

लोगों को धोखा देकर अपना स्वार्थ साधना, छल, प्रपंच, माया, दंभ, भय, अत्याचार, कपट और धूर्तता से दूसरों के अधिकारों को अपहरण कर स्वयं सम्पन्न बनना नास्तिकता का स्पष्ट प्रमाण है। जो पाप करने का दुस्साहस करता है वह आस्तिक नहीं हो सकता, भले ही वह आस्तिकता का कितना ही बड़ा प्रदर्शन क्यों न करता हो

आस्तिकता का दृष्टिकोण बनते ही मनुष्य भीतर और बाहर से निष्पाप होने लगता है। वह सबसे नम्रता का मधुरता का स्नेह का आदर का सेवा का सरलता शुद्धता और निष्कपटता से भरा हुआ व्यवहार करता है। वह अपने स्वार्थों की उतनी परवाह नहीं करता है, खुद कुछ कष्ट भी उठाना पड़े तो उठाता है पर दूसरों का बुरा और अहित कभी नहीं करता है । Share this: